राम नाम का गोदना पूरे शरीर पर – ramnami samaj chhattisgarh की अनोखी भक्ति परंपरा जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान

रामनामी समाज के लोग शरीर पर राम नाम का गोदना बनाकर, मोरपंख मुकुट और राम नाम लिखे वस्त्र पहनकर भक्ति करते हुए – छत्तीसगढ़ की अनोखी परंपरा

ramnami samaj chhattisgarh Introduction: छत्तीसगढ़ में भक्ति की एक ऐसी अनोखी परंपरा है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है।

यह परंपरा है रामनामी समाज की, जहां लोग अपने पूरे शरीर पर “राम” नाम का गोदना बनवाकर भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा दिखाते हैं।

पूरे शरीर में राम नाम, सिर पर मोरपंख का मुकुट और राम नाम लिखे वस्त्र पहनकर ये लोग भक्ति की अलख जगाते हैं।

 

🕉️ 100 साल से भी पुरानी परंपरा: रामनामी समाज की यह अनोखी परंपरा करीब 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है।

हर साल पूष मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम, द्वितीय और तृतीया तिथि को यह भक्ति विशेष रूप से देखने को मिलती है।

इस दौरान अखिल भारतीय रामनाम महासभा द्वारा भव्य रामनामी मेला आयोजित किया जाता है।

हाल ही में यह मेला छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के ग्राम कोदवा में आयोजित हुआ, जो 105वां धर्म मेला था।

👉 इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1911 से मानी जाती है

👉 और इसकी प्रेरणा वर्ष 1888 में एक संत पुरुष द्वारा दी गई थी

 

🙏 शरीर ही बन जाता है “राम का मंदिर”: रामनामी समाज के लोग मानते हैं कि हर इंसान के भीतर भगवान श्रीराम का वास होता है।

👉 इसलिए वे पूरे शरीर पर “राम” नाम का गोदना बनवाते हैं

👉 एक-दूसरे को “राम-राम” कहकर संबोधित करते हैं

👉 हर समय राम नाम का जाप करते हैं

उनकी मान्यता है कि शरीर पर लिखा हर “राम” उन्हें भगवान से जोड़ता है।

 

🎉 मेले में दिखती है अनोखी भक्ति: रामनामी मेले में भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है

👉 पहले दिन भव्य कलश यात्रा निकाली जाती है

👉 दूसरे और अंतिम दिन रामचरित मानस का पाठ होता है

👉 साथ ही राम नाम का सामूहिक जाप किया जाता है

यह मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का उत्सव है।

 

🚫 मूर्ति पूजा के खिलाफ परंपरा: रामनामी समाज की एक खास बात यह है कि ये लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते।

👉 भगवान श्रीराम को अपना आराध्य मानते हैं

👉 मांस और मदिरा का सेवन नहीं करते

👉 सादगी और सदाचार का जीवन जीते हैं

 

🧑‍⚖️ धर्म गुरु का चयन: रामनामी समाज में धर्म गुरु का चुनाव भी किया जाता है।

👉 वही व्यक्ति धर्म गुरु बनता है जो

मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो

सादगीपूर्ण जीवन जीता हो

👉 यह संस्था धन संग्रह नहीं करती

👉 समाज की सेवा में ही सहयोग राशि का उपयोग होता है

 

😮 जिह्वा (जीभ) में भी “राम”: इस समाज की भक्ति का सबसे अनोखा रूप तब देखने को मिलता है जब कुछ लोग अपने शरीर के साथ-साथ जीभ (जिह्वा) पर भी “राम” का गोदना बनवाते हैं।

👉 ब्रह्मचारी आचार्य कार्तिक राम साधु ने

17 साल की उम्र में अपनी जीभ पर “राम” लिखवाया

यह उनकी गहरी श्रद्धा और समर्पण को दिखाता है।

 

⏳ समय के साथ बदलती परंपरा: समाज में पहले कुछ कठोर नियम भी थे

👉 जैसे विवाह के बाद वधु के शरीर पर “राम” अंकित होने तक

उसके हाथ का अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता था

लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

 

💬 Conclusion: रामनामी समाज की यह परंपरा हमें सिखाती है कि

👉 सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आस्था में होती है

पूरे शरीर पर “राम” लिखवाकर ये लोग यह संदेश देते हैं कि

भगवान हर इंसान के अंदर बसते हैं।

यह अनोखी परंपरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है, जो आज भी लोगों को भक्ति और सादगी का रास्ता दिखा रही है।

 

सुने छत्तीसगढ़ के कारगिल युद्ध वीर शहीद कौशल यादव की शहादत की कहानी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *